<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-2706481286702833292</id><updated>2011-12-13T11:06:15.458-08:00</updated><title type='text'>युवा जोश</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://madhushala-yuvajosh.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2706481286702833292/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://madhushala-yuvajosh.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>Arvind Gaurav</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/-7LZ1bBHj7P4/Tkvw9uNzsoI/AAAAAAAAAsc/Wa-8Z9dlAaA/s220/Arvind%2Bkumar%2BGaurav.JPG'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>2</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2706481286702833292.post-7642546396855659470</id><published>2008-11-09T23:06:00.000-08:00</published><updated>2008-11-09T23:09:16.228-08:00</updated><title type='text'>गुलाब और बुलबुल</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#cc0000;"&gt;गुलाब और बुलबुल&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;रचनाकार : त्रिलोचन&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;बिस्तरा है न चारपाई है,&lt;br /&gt;जिन्दगी खूब हमने पायी है।&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;/span&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;कल अंधेरे में जिसने सर काटा,&lt;br /&gt;नाम मत लो हमारा भाई है।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;ठोकरें दर-ब-दर की थी हम थे,&lt;br /&gt;कम नहीं हमने मुँह की खाई है।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;कब तलक तीर वे नहीं छूते,&lt;br /&gt;अब इसी बात पर लड़ाई है।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;आदमी जी रहा है मरने को&lt;br /&gt;सबसे ऊपर यही सचाई है।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;कच्चे ही हो अभी त्रिलोचन तुम&lt;br /&gt;धुन कहाँ वह सँभल के आई है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;कोई दिन था जबकि हमको भी बहुत कुछ याद था&lt;br /&gt;आज वीराना हुआ है, पहले दिल आबाद था।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;अपनी चर्चा से शुरू करते हैं अब तो बात सब,&lt;br /&gt;और पहले यह विषय आया तो सबके बाद था।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;गुल गया, गुलशन गया, बुलबुल गया, फिर क्या रहा&lt;br /&gt;पूछते हैं अब व` ठहरा किस जगह सैयाद था।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;मारे मारे फिरते हैं उस्ताद अब तो देख लो,&lt;br /&gt;मर्म जो समझे कहे पहले वही उस्ताद था।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;मन मिला तो मिल गये और मन हटा तो हट गये,&lt;br /&gt;मन की इन मौजों प` कोई भी नंहीं मतवाद था।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;रंग कुछ ऐसा रहा और मौज कुछ ऐसी रही,&lt;br /&gt;आपबीती भी मेरी वह समझे कोई वाद था।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;अन्न-जल की बात है, हमने त्रिलोचन को सुना,&lt;br /&gt;आजकल काशी में हैं, कुछ दिन इलाहाबाद था।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2706481286702833292-7642546396855659470?l=madhushala-yuvajosh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://madhushala-yuvajosh.blogspot.com/feeds/7642546396855659470/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2706481286702833292&amp;postID=7642546396855659470' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2706481286702833292/posts/default/7642546396855659470'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2706481286702833292/posts/default/7642546396855659470'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://madhushala-yuvajosh.blogspot.com/2008/11/blog-post_09.html' title='गुलाब और बुलबुल'/><author><name>Arvind Gaurav</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/-7LZ1bBHj7P4/Tkvw9uNzsoI/AAAAAAAAAsc/Wa-8Z9dlAaA/s220/Arvind%2Bkumar%2BGaurav.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2706481286702833292.post-7920642882165355394</id><published>2008-11-01T04:35:00.000-07:00</published><updated>2008-11-02T04:45:49.384-08:00</updated><title type='text'>मधुशाला</title><content type='html'>मधुशाला&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला,&lt;br /&gt;प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला,&lt;br /&gt;पहले भोग लगा लूँ तेरा फिर प्रसाद जग पाएगा,&lt;br /&gt;सबसे पहले तेरा स्वागत करती मेरी मधुशाला।।१। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्यास तुझे तो, विश्व तपाकर पूर्ण निकालूँगा हाला,&lt;br /&gt;एक पाँव से साकी बनकर नाचूँगा लेकर प्याला,&lt;br /&gt;जीवन की मधुता तो तेरे ऊपर कब का वार चुका,&lt;br /&gt;आज निछावर कर दूँगा मैं तुझ पर जग की मधुशाला।।२।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रियतम, तू मेरी हाला है, मैं तेरा प्यासा प्याला,&lt;br /&gt;अपने को मुझमें भरकर तू बनता है पीनेवाला,&lt;br /&gt;मैं तुझको छक छलका करता, मस्त मुझे पी तू होता,&lt;br /&gt;एक दूसरे की हम दोनों आज परस्पर मधुशाला।।३।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भावुकता अंगूर लता से खींच कल्पना की हाला,&lt;br /&gt;कवि साकी बनकर आया है भरकर कविता का प्याला,&lt;br /&gt;कभी न कण-भर खाली होगा लाख पिएँ, दो लाख पिएँ!&lt;br /&gt;पाठकगण हैं पीनेवाले, पुस्तक मेरी मधुशाला।।४।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मधुर भावनाओं की सुमधुर नित्य बनाता हूँ हाला,&lt;br /&gt;भरता हूँ इस मधु से अपने अंतर का प्यासा प्याला,&lt;br /&gt;उठा कल्पना के हाथों से स्वयं उसे पी जाता हूँ,&lt;br /&gt;अपने ही में हूँ मैं साकी, पीनेवाला, मधुशाला।।५।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवला,&lt;br /&gt;'किस पथ से जाऊँ?' असमंजस में है वह भोलाभाला,&lt;br /&gt;अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ -&lt;br /&gt;'राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।'। ६।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चलने ही चलने में कितना जीवन, हाय, बिता डाला!&lt;br /&gt;'दूर अभी है', पर, कहता है हर पथ बतलानेवाला,&lt;br /&gt;हिम्मत है न बढूँ आगे को साहस है न फिरुँ पीछे,&lt;br /&gt;किंकर्तव्यविमूढ़ मुझे कर दूर खड़ी है मधुशाला।।७।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुख से तू अविरत कहता जा मधु, मदिरा, मादक हाला,&lt;br /&gt;हाथों में अनुभव करता जा एक ललित कल्पित प्याला,&lt;br /&gt;ध्यान किए जा मन में सुमधुर सुखकर, सुंदर साकी का,&lt;br /&gt;और बढ़ा चल, पथिक, न तुझको दूर लगेगी मधुशाला।।८।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मदिरा पीने की अभिलाषा ही बन जाए जब हाला,&lt;br /&gt;अधरों की आतुरता में ही जब आभासित हो प्याला,&lt;br /&gt;बने ध्यान ही करते-करते जब साकी साकार, सखे,&lt;br /&gt;रहे न हाला, प्याला, साकी, तुझे मिलेगी मधुशाला।।९।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुन, कलकल़ , छलछल़ मधुघट से गिरती प्यालों में हाला,&lt;br /&gt;सुन, रूनझुन रूनझुन चल वितरण करती मधु साकीबाला,&lt;br /&gt;बस आ पहुंचे, दुर नहीं कुछ, चार कदम अब चलना है,&lt;br /&gt;चहक रहे, सुन, पीनेवाले, महक रही, ले, मधुशाला।।१०।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जलतरंग बजता, जब चुंबन करता प्याले को प्याला,&lt;br /&gt;वीणा झंकृत होती, चलती जब रूनझुन साकीबाला,&lt;br /&gt;डाँट डपट मधुविक्रेता की ध्वनित पखावज करती है,&lt;br /&gt;मधुरव से मधु की मादकता और बढ़ाती मधुशाला।।११।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेंहदी रंजित मृदुल हथेली पर माणिक मधु का प्याला,&lt;br /&gt;अंगूरी अवगुंठन डाले स्वर्ण वर्ण साकीबाला,&lt;br /&gt;पाग बैंजनी, जामा नीला डाट डटे पीनेवाले,&lt;br /&gt;इन्द्रधनुष से होड़ लगाती आज रंगीली मधुशाला।।१२।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाथों में आने से पहले नाज़ दिखाएगा प्याला,&lt;br /&gt;अधरों पर आने से पहले अदा दिखाएगी हाला,&lt;br /&gt;बहुतेरे इनकार करेगा साकी आने से पहले,&lt;br /&gt;पथिक, न घबरा जाना, पहले मान करेगी मधुशाला।।१३।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लाल सुरा की धार लपट सी कह न इसे देना ज्वाला,&lt;br /&gt;फेनिल मदिरा है, मत इसको कह देना उर का छाला,&lt;br /&gt;दर्द नशा है इस मदिरा का विगत स्मृतियाँ साकी हैं,&lt;br /&gt;पीड़ा में आनंद जिसे हो, आए मेरी मधुशाला।।१४।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जगती की शीतल हाला सी पथिक, नहीं मेरी हाला,&lt;br /&gt;जगती के ठंडे प्याले सा पथिक, नहीं मेरा प्याला,&lt;br /&gt;ज्वाल सुरा जलते प्याले में दग्ध हृदय की कविता है,&lt;br /&gt;जलने से भयभीत न जो हो, आए मेरी मधुशाला।।१५।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहती हाला देखी, देखो लपट उठाती अब हाला,&lt;br /&gt;देखो प्याला अब छूते ही होंठ जला देनेवाला,&lt;br /&gt;'होंठ नहीं, सब देह दहे, पर पीने को दो बूंद मिले'&lt;br /&gt;ऐसे मधु के दीवानों को आज बुलाती मधुशाला।।१६।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धर्मग्रन्थ सब जला चुकी है, जिसके अंतर की ज्वाला,&lt;br /&gt;मंदिर, मसजिद, गिरिजे, सब को तोड़ चुका जो मतवाला,&lt;br /&gt;पंडित, मोमिन, पादिरयों के फंदों को जो काट चुका,&lt;br /&gt;कर सकती है आज उसी का स्वागत मेरी मधुशाला।।१७।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लालायित अधरों से जिसने, हाय, नहीं चूमी हाला,&lt;br /&gt;हर्ष-विकंपित कर से जिसने, हा, न छुआ मधु का प्याला,&lt;br /&gt;हाथ पकड़ लज्जित साकी को पास नहीं जिसने खींचा,&lt;br /&gt;व्यर्थ सुखा डाली जीवन की उसने मधुमय मधुशाला।।१८।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बने पुजारी प्रेमी साकी, गंगाजल पावन हाला,&lt;br /&gt;रहे फेरता अविरत गति से मधु के प्यालों की माला'&lt;br /&gt;'और लिये जा, और पीये जा', इसी मंत्र का जाप करे'&lt;br /&gt;मैं शिव की प्रतिमा बन बैठूं, मंदिर हो यह मधुशाला।।१९।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बजी न मंदिर में घड़ियाली, चढ़ी न प्रतिमा पर माला,&lt;br /&gt;बैठा अपने भवन मुअज्ज़िन देकर मस्जिद में ताला,&lt;br /&gt;लुटे ख़जाने नरपितयों के गिरीं गढ़ों की दीवारें,&lt;br /&gt;रहें मुबारक पीनेवाले, खुली रहे यह मधुशाला।।२०।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बड़े बड़े पिरवार मिटें यों, एक न हो रोनेवाला,&lt;br /&gt;हो जाएँ सुनसान महल वे, जहाँ थिरकतीं सुरबाला,&lt;br /&gt;राज्य उलट जाएँ, भूपों की भाग्य सुलक्ष्मी सो जाए,&lt;br /&gt;जमे रहेंगे पीनेवाले, जगा करेगी मधुशाला।।२१।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सब मिट जाएँ, बना रहेगा सुन्दर साकी, यम काला,&lt;br /&gt;सूखें सब रस, बने रहेंगे, किन्तु, हलाहल औ' हाला,&lt;br /&gt;धूमधाम औ' चहल पहल के स्थान सभी सुनसान बनें,&lt;br /&gt;झगा करेगा अविरत मरघट, जगा करेगी मधुशाला।।२२।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भुरा सदा कहलायेगा जग में बाँका, मदचंचल प्याला,&lt;br /&gt;छैल छबीला, रसिया साकी, अलबेला पीनेवाला,&lt;br /&gt;पटे कहाँ से, मधु औ' जग की जोड़ी ठीक नहीं,&lt;br /&gt;जग जर्जर प्रतिदन, प्रतिक्षण, पर नित्य नवेली मधुशाला।।२३।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिना पिये जो मधुशाला को बुरा कहे, वह मतवाला,&lt;br /&gt;पी लेने पर तो उसके मुह पर पड़ जाएगा ताला,&lt;br /&gt;दास द्रोहियों दोनों में है जीत सुरा की, प्याले की,&lt;br /&gt;विश्वविजयिनी बनकर जग में आई मेरी मधुशाला।।२४।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हरा भरा रहता मदिरालय, जग पर पड़ जाए पाला,&lt;br /&gt;वहाँ मुहर्रम का तम छाए, यहाँ होलिका की ज्वाला,&lt;br /&gt;स्वर्ग लोक से सीधी उतरी वसुधा पर, दुख क्या जाने,&lt;br /&gt;पढ़े मर्सिया दुनिया सारी, ईद मनाती मधुशाला।।२५।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बरस में, एक बार ही जगती होली की ज्वाला,&lt;br /&gt;एक बार ही लगती बाज़ी, जलती दीपों की माला,&lt;br /&gt;दुनियावालों, किन्तु, किसी दिन आ मदिरालय में देखो,&lt;br /&gt;दिन को होली, रात दिवाली, रोज़ मनाती मधुशाला।।२६।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नहीं जानता कौन, मनुज आया बनकर पीनेवाला,&lt;br /&gt;कौन अपिरिचत उस साकी से, जिसने दूध पिला पाला,&lt;br /&gt;जीवन पाकर मानव पीकर मस्त रहे, इस कारण ही,&lt;br /&gt;जग में आकर सबसे पहले पाई उसने मधुशाला।।२७।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बनी रहें अंगूर लताएँ जिनसे मिलती है हाला,&lt;br /&gt;बनी रहे वह मिटटी जिससे बनता है मधु का प्याला,&lt;br /&gt;बनी रहे वह मदिर पिपासा तृप्त न जो होना जाने,&lt;br /&gt;बनें रहें ये पीने वाले, बनी रहे यह मधुशाला।।२८।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सकुशल समझो मुझको, सकुशल रहती यदि साकीबाला,&lt;br /&gt;मंगल और अमंगल समझे मस्ती में क्या मतवाला,&lt;br /&gt;मित्रों, मेरी क्षेम न पूछो आकर, पर मधुशाला की,&lt;br /&gt;कहा करो 'जय राम' न मिलकर, कहा करो 'जय मधुशाला'।।२९।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सूर्य बने मधु का विक्रेता, सिंधु बने घट, जल, हाला,&lt;br /&gt;बादल बन-बन आए साकी, भूमि बने मधु का प्याला,&lt;br /&gt;झड़ी लगाकर बरसे मदिरा रिमझिम, रिमझिम, रिमझिम कर,&lt;br /&gt;बेलि, विटप, तृण बन मैं पीऊँ, वर्षा ऋतु हो मधुशाला।।३०।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तारक मणियों से सज्जित नभ बन जाए मधु का प्याला,&lt;br /&gt;सीधा करके भर दी जाए उसमें सागरजल हाला,&lt;br /&gt;मज्ञल्तऌा समीरण साकी बनकर अधरों पर छलका जाए,&lt;br /&gt;फैले हों जो सागर तट से विश्व बने यह मधुशाला।।३१।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अधरों पर हो कोई भी रस जिहवा पर लगती हाला,&lt;br /&gt;भाजन हो कोई हाथों में लगता रक्खा है प्याला,&lt;br /&gt;हर सूरत साकी की सूरत में परिवर्तित हो जाती,&lt;br /&gt;आँखों के आगे हो कुछ भी, आँखों में है मधुशाला।।३२।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पौधे आज बने हैं साकी ले ले फूलों का प्याला,&lt;br /&gt;भरी हुई है जिसके अंदर पिरमल-मधु-सुरिभत हाला,&lt;br /&gt;माँग माँगकर भ्रमरों के दल रस की मदिरा पीते हैं,&lt;br /&gt;झूम झपक मद-झंपित होते, उपवन क्या है मधुशाला!।३३।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रति रसाल तरू साकी सा है, प्रति मंजरिका है प्याला,&lt;br /&gt;छलक रही है जिसके बाहर मादक सौरभ की हाला,&lt;br /&gt;छक जिसको मतवाली कोयल कूक रही डाली डाली&lt;br /&gt;हर मधुऋतु में अमराई में जग उठती है मधुशाला।।३४।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मंद झकोरों के प्यालों में मधुऋतु सौरभ की हाला&lt;br /&gt;भर भरकर है अनिल पिलाता बनकर मधु-मद-मतवाला,&lt;br /&gt;हरे हरे नव पल्लव, तरूगण, नूतन डालें, वल्लरियाँ,&lt;br /&gt;छक छक, झुक झुक झूम रही हैं, मधुबन में है मधुशाला।।३५।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साकी बन आती है प्रातः जब अरुणा ऊषा बाला,&lt;br /&gt;तारक-मणि-मंडित चादर दे मोल धरा लेती हाला,&lt;br /&gt;अगणित कर-किरणों से जिसको पी, खग पागल हो गाते,&lt;br /&gt;प्रति प्रभात में पूर्ण प्रकृति में मुखिरत होती मधुशाला।।३६।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उतर नशा जब उसका जाता, आती है संध्या बाला,&lt;br /&gt;बड़ी पुरानी, बड़ी नशीली नित्य ढला जाती हाला,&lt;br /&gt;जीवन के संताप शोक सब इसको पीकर मिट जाते&lt;br /&gt;सुरा-सुप्त होते मद-लोभी जागृत रहती मधुशाला।।३७।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंधकार है मधुविक्रेता, सुन्दर साकी शशिबाला&lt;br /&gt;किरण किरण में जो छलकाती जाम जुम्हाई का हाला,&lt;br /&gt;पीकर जिसको चेतनता खो लेने लगते हैं झपकी&lt;br /&gt;तारकदल से पीनेवाले, रात नहीं है, मधुशाला।।३८।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी ओर मैं आँखें फेरूँ, दिखलाई देती हाला&lt;br /&gt;किसी ओर मैं आँखें फेरूँ, दिखलाई देता प्याला,&lt;br /&gt;किसी ओर मैं देखूं, मुझको दिखलाई देता साकी&lt;br /&gt;किसी ओर देखूं, दिखलाई पड़ती मुझको मधुशाला।।३९।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साकी बन मुरली आई साथ लिए कर में प्याला,&lt;br /&gt;जिनमें वह छलकाती लाई अधर-सुधा-रस की हाला,&lt;br /&gt;योगिराज कर संगत उसकी नटवर नागर कहलाए,&lt;br /&gt;देखो कैसों-कैसों को है नाच नचाती मधुशाला।।४०।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वादक बन मधु का विक्रेता लाया सुर-सुमधुर-हाला,&lt;br /&gt;रागिनियाँ बन साकी आई भरकर तारों का प्याला,&lt;br /&gt;विक्रेता के संकेतों पर दौड़ लयों, आलापों में,&lt;br /&gt;पान कराती श्रोतागण को, झंकृत वीणा मधुशाला।।४१।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चित्रकार बन साकी आता लेकर तूली का प्याला,&lt;br /&gt;जिसमें भरकर पान कराता वह बहु रस-रंगी हाला,&lt;br /&gt;मन के चित्र जिसे पी-पीकर रंग-बिरंगे हो जाते,&lt;br /&gt;चित्रपटी पर नाच रही है एक मनोहर मधुशाला।।४२।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घन श्यामल अंगूर लता से खिंच खिंच यह आती हाला,&lt;br /&gt;अरूण-कमल-कोमल कलियों की प्याली, फूलों का प्याला,&lt;br /&gt;लोल हिलोरें साकी बन बन माणिक मधु से भर जातीं,&lt;br /&gt;हंस मज्ञल्तऌा होते पी पीकर मानसरोवर मधुशाला।।४३।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिम श्रेणी अंगूर लता-सी फैली, हिम जल है हाला,&lt;br /&gt;चंचल नदियाँ साकी बनकर, भरकर लहरों का प्याला,&lt;br /&gt;कोमल कूर-करों में अपने छलकाती निशिदिन चलतीं,&lt;br /&gt;पीकर खेत खड़े लहराते, भारत पावन मधुशाला।।४४।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीर सुतों के हृदय रक्त की आज बना रक्तिम हाला,&lt;br /&gt;वीर सुतों के वर शीशों का हाथों में लेकर प्याला,&lt;br /&gt;अति उदार दानी साकी है आज बनी भारतमाता,&lt;br /&gt;स्वतंत्रता है तृषित कालिका बलिवेदी है मधुशाला।।४५।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुतकारा मस्जिद ने मुझको कहकर है पीनेवाला,&lt;br /&gt;ठुकराया ठाकुरद्वारे ने देख हथेली पर प्याला,&lt;br /&gt;कहाँ ठिकाना मिलता जग में भला अभागे काफिर को?&lt;br /&gt;शरणस्थल बनकर न मुझे यदि अपना लेती मधुशाला।।४६।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पथिक बना मैं घूम रहा हूँ, सभी जगह मिलती हाला,&lt;br /&gt;सभी जगह मिल जाता साकी, सभी जगह मिलता प्याला,&lt;br /&gt;मुझे ठहरने का, हे मित्रों, कष्ट नहीं कुछ भी होता,&lt;br /&gt;मिले न मंदिर, मिले न मस्जिद, मिल जाती है मधुशाला।।४७।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सजें न मस्जिद और नमाज़ी कहता है अल्लाताला,&lt;br /&gt;सजधजकर, पर, साकी आता, बन ठनकर, पीनेवाला,&lt;br /&gt;शेख, कहाँ तुलना हो सकती मस्जिद की मदिरालय से&lt;br /&gt;चिर विधवा है मस्जिद तेरी, सदा सुहागिन मधुशाला।।४८।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बजी नफ़ीरी और नमाज़ी भूल गया अल्लाताला,&lt;br /&gt;गाज गिरी, पर ध्यान सुरा में मग्न रहा पीनेवाला,&lt;br /&gt;शेख, बुरा मत मानो इसको, साफ़ कहूँ तो मस्जिद को&lt;br /&gt;अभी युगों तक सिखलाएगी ध्यान लगाना मधुशाला!।४९।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुसलमान औ' हिन्दू है दो, एक, मगर, उनका प्याला,&lt;br /&gt;एक, मगर, उनका मदिरालय, एक, मगर, उनकी हाला,&lt;br /&gt;दोनों रहते एक न जब तक मस्जिद मन्दिर में जाते,&lt;br /&gt;बैर बढ़ाते मस्जिद मन्दिर मेल कराती मधुशाला!।५०।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई भी हो शेख नमाज़ी या पंडित जपता माला,&lt;br /&gt;बैर भाव चाहे जितना हो मदिरा से रखनेवाला,&lt;br /&gt;एक बार बस मधुशाला के आगे से होकर निकले,&lt;br /&gt;देखूँ कैसे थाम न लेती दामन उसका मधुशाला!।५१।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और रसों में स्वाद तभी तक, दूर जभी तक है हाला,&lt;br /&gt;इतरा लें सब पात्र न जब तक, आगे आता है प्याला,&lt;br /&gt;कर लें पूजा शेख, पुजारी तब तक मस्जिद मन्दिर में&lt;br /&gt;घूँघट का पट खोल न जब तक झाँक रही है मधुशाला।।५२।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज करे परहेज़ जगत, पर, कल पीनी होगी हाला,&lt;br /&gt;आज करे इन्कार जगत पर कल पीना होगा प्याला,&lt;br /&gt;होने दो पैदा मद का महमूद जगत में कोई, फिर&lt;br /&gt;जहाँ अभी हैं मन्िदर मस्जिद वहाँ बनेगी मधुशाला।।५३।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यज्ञ अग्नि सी धधक रही है मधु की भटठी की ज्वाला,&lt;br /&gt;ऋषि सा ध्यान लगा बैठा है हर मदिरा पीने वाला,&lt;br /&gt;मुनि कन्याओं सी मधुघट ले फिरतीं साकीबालाएँ,&lt;br /&gt;किसी तपोवन से क्या कम है मेरी पावन मधुशाला।।५४।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोम सुरा पुरखे पीते थे, हम कहते उसको हाला,&lt;br /&gt;द्रोणकलश जिसको कहते थे, आज वही मधुघट आला,&lt;br /&gt;वेदिवहित यह रस्म न छोड़ो वेदों के ठेकेदारों,&lt;br /&gt;युग युग से है पुजती आई नई नहीं है मधुशाला।।५५।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वही वारूणी जो थी सागर मथकर निकली अब हाला,&lt;br /&gt;रंभा की संतान जगत में कहलाती 'साकीबाला',&lt;br /&gt;देव अदेव जिसे ले आए, संत महंत मिटा देंगे!&lt;br /&gt;किसमें कितना दम खम, इसको खूब समझती मधुशाला।।५६।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी न सुन पड़ता, 'इसने, हा, छू दी मेरी हाला',&lt;br /&gt;कभी न कोई कहता, 'उसने जूठा कर डाला प्याला',&lt;br /&gt;सभी जाति के लोग यहाँ पर साथ बैठकर पीते हैं,&lt;br /&gt;सौ सुधारकों का करती है काम अकेले मधुशाला।।५७।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्रम, संकट, संताप, सभी तुम भूला करते पी हाला,&lt;br /&gt;सबक बड़ा तुम सीख चुके यदि सीखा रहना मतवाला,&lt;br /&gt;व्यर्थ बने जाते हो हिरजन, तुम तो मधुजन ही अच्छे,&lt;br /&gt;ठुकराते हिर मंिदरवाले, पलक बिछाती मधुशाला।।५८।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक तरह से सबका स्वागत करती है साकीबाला,&lt;br /&gt;अज्ञ विज्ञ में है क्या अंतर हो जाने पर मतवाला,&lt;br /&gt;रंक राव में भेद हुआ है कभी नहीं मदिरालय में,&lt;br /&gt;साम्यवाद की प्रथम प्रचारक है यह मेरी मधुशाला।।५९।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बार बार मैंने आगे बढ़ आज नहीं माँगी हाला,&lt;br /&gt;समझ न लेना इससे मुझको साधारण पीने वाला,&lt;br /&gt;हो तो लेने दो ऐ साकी दूर प्रथम संकोचों को,&lt;br /&gt;मेरे ही स्वर से फिर सारी गूँज उठेगी मधुशाला।।६०।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कल? कल पर विश्वास किया कब करता है पीनेवाला&lt;br /&gt;हो सकते कल कर जड़ जिनसे फिर फिर आज उठा प्याला,&lt;br /&gt;आज हाथ में था, वह खोया, कल का कौन भरोसा है,&lt;br /&gt;कल की हो न मुझे मधुशाला काल कुटिल की मधुशाला।।६१।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज मिला अवसर, तब फिर क्यों मैं न छकूँ जी-भर हाला&lt;br /&gt;आज मिला मौका, तब फिर क्यों ढाल न लूँ जी-भर प्याला,&lt;br /&gt;छेड़छाड़ अपने साकी से आज न क्यों जी-भर कर लूँ,&lt;br /&gt;एक बार ही तो मिलनी है जीवन की यह मधुशाला।।६२।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज सजीव बना लो, प्रेयसी, अपने अधरों का प्याला,&lt;br /&gt;भर लो, भर लो, भर लो इसमें, यौवन मधुरस की हाला,&lt;br /&gt;और लगा मेरे होठों से भूल हटाना तुम जाओ,&lt;br /&gt;अथक बनू मैं पीनेवाला, खुले प्रणय की मधुशाला।।६३।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुमुखी तुम्हारा, सुन्दर मुख ही, मुझको कन्चन का प्याला&lt;br /&gt;छलक रही है जिसमंे माणिक रूप मधुर मादक हाला,&lt;br /&gt;मैं ही साकी बनता, मैं ही पीने वाला बनता हूँ&lt;br /&gt;जहाँ कहीं मिल बैठे हम तुम़ वहीं गयी हो मधुशाला।।६४।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दो दिन ही मधु मुझे पिलाकर ऊब उठी साकीबाला,&lt;br /&gt;भरकर अब खिसका देती है वह मेरे आगे प्याला,&lt;br /&gt;नाज़, अदा, अंदाजों से अब, हाय पिलाना दूर हुआ,&lt;br /&gt;अब तो कर देती है केवल फ़र्ज़ -अदाई मधुशाला।।६५।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छोटे-से जीवन में कितना प्यार करुँ, पी लूँ हाला,&lt;br /&gt;आने के ही साथ जगत में कहलाया 'जानेवाला',&lt;br /&gt;स्वागत के ही साथ विदा की होती देखी तैयारी,&lt;br /&gt;बंद लगी होने खुलते ही मेरी जीवन-मधुशाला।।६६।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या पीना, निर्द्वन्द न जब तक ढाला प्यालों पर प्याला,&lt;br /&gt;क्या जीना, निरंिचत न जब तक साथ रहे साकीबाला,&lt;br /&gt;खोने का भय, हाय, लगा है पाने के सुख के पीछे,&lt;br /&gt;मिलने का आनंद न देती मिलकर के भी मधुशाला।।६७।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे पिलाने को लाए हो इतनी थोड़ी-सी हाला! &lt;br /&gt;मुझे दिखाने को लाए हो एक यही छिछला प्याला!&lt;br /&gt;इतनी पी जीने से अच्छा सागर की ले प्यास मरुँ,&lt;br /&gt;सिंधँु-तृषा दी किसने रचकर बिंदु-बराबर मधुशाला।।६८।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या कहता है, रह न गई अब तेरे भाजन में हाला,&lt;br /&gt;क्या कहता है, अब न चलेगी मादक प्यालों की माला,&lt;br /&gt;थोड़ी पीकर प्यास बढ़ी तो शेष नहीं कुछ पीने को,&lt;br /&gt;प्यास बुझाने को बुलवाकर प्यास बढ़ाती मधुशाला।।६९।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लिखी भाग्य में जितनी बस उतनी ही पाएगा हाला,&lt;br /&gt;लिखा भाग्य में जैसा बस वैसा ही पाएगा प्याला,&lt;br /&gt;लाख पटक तू हाथ पाँव, पर इससे कब कुछ होने का,&lt;br /&gt;लिखी भाग्य में जो तेरे बस वही मिलेगी मधुशाला।।७०।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कर ले, कर ले कंजूसी तू मुझको देने में हाला,&lt;br /&gt;दे ले, दे ले तू मुझको बस यह टूटा फूटा प्याला,&lt;br /&gt;मैं तो सब्र इसी पर करता, तू पीछे पछताएगी,&lt;br /&gt;जब न रहूँगा मैं, तब मेरी याद करेगी मधुशाला।।७१।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ध्यान मान का, अपमानों का छोड़ दिया जब पी हाला,&lt;br /&gt;गौरव भूला, आया कर में जब से मिट्टी का प्याला,&lt;br /&gt;साकी की अंदाज़ भरी झिड़की में क्या अपमान धरा,&lt;br /&gt;दुनिया भर की ठोकर खाकर पाई मैंने मधुशाला।।७२।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्षीण, क्षुद्र, क्षणभंगुर, दुर्बल मानव मिटटी का प्याला,&lt;br /&gt;भरी हुई है जिसके अंदर कटु-मधु जीवन की हाला,&lt;br /&gt;मृत्यु बनी है निर्दय साकी अपने शत-शत कर फैला,&lt;br /&gt;काल प्रबल है पीनेवाला, संसृति है यह मधुशाला।।७३।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्याले सा गढ़ हमें किसी ने भर दी जीवन की हाला,&lt;br /&gt;नशा न भाया, ढाला हमने ले लेकर मधु का प्याला,&lt;br /&gt;जब जीवन का दर्द उभरता उसे दबाते प्याले से,&lt;br /&gt;जगती के पहले साकी से जूझ रही है मधुशाला।।७४।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने अंगूरों से तन में हमने भर ली है हाला,&lt;br /&gt;क्या कहते हो, शेख, नरक में हमें तपाएगी ज्वाला,&lt;br /&gt;तब तो मदिरा खूब खिंचेगी और पिएगा भी कोई,&lt;br /&gt;हमें नमक की ज्वाला में भी दीख पड़ेगी मधुशाला।।७५।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यम आएगा लेने जब, तब खूब चलूँगा पी हाला,&lt;br /&gt;पीड़ा, संकट, कष्ट नरक के क्या समझेगा मतवाला,&lt;br /&gt;क्रूर, कठोर, कुटिल, कुविचारी, अन्यायी यमराजों के&lt;br /&gt;डंडों की जब मार पड़ेगी, आड़ करेगी मधुशाला।।७६।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि इन अधरों से दो बातें प्रेम भरी करती हाला,&lt;br /&gt;यदि इन खाली हाथों का जी पल भर बहलाता प्याला,&lt;br /&gt;हानि बता, जग, तेरी क्या है, व्यर्थ मुझे बदनाम न कर,&lt;br /&gt;मेरे टूटे दिल का है बस एक खिलौना मधुशाला।।७७।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;याद न आए दूखमय जीवन इससे पी लेता हाला,&lt;br /&gt;जग चिंताओं से रहने को मुक्त, उठा लेता प्याला,&lt;br /&gt;शौक, साध के और स्वाद के हेतु पिया जग करता है,&lt;br /&gt;पर मै वह रोगी हूँ जिसकी एक दवा है मधुशाला।।७८।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गिरती जाती है दिन प्रतिदन प्रणयनी प्राणों की हाला&lt;br /&gt;भग्न हुआ जाता दिन प्रतिदन सुभगे मेरा तन प्याला,&lt;br /&gt;रूठ रहा है मुझसे रूपसी, दिन दिन यौवन का साकी&lt;br /&gt;सूख रही है दिन दिन सुन्दरी, मेरी जीवन मधुशाला।।७९।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यम आयेगा साकी बनकर साथ लिए काली हाला,&lt;br /&gt;पी न होश में फिर आएगा सुरा-विसुध यह मतवाला,&lt;br /&gt;यह अंितम बेहोशी, अंतिम साकी, अंतिम प्याला है,&lt;br /&gt;पथिक, प्यार से पीना इसको फिर न मिलेगी मधुशाला।८०।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ढलक रही है तन के घट से, संगिनी जब जीवन हाला&lt;br /&gt;पत्र गरल का ले जब अंतिम साकी है आनेवाला,&lt;br /&gt;हाथ स्पर्श भूले प्याले का, स्वाद सुरा जीव्हा भूले&lt;br /&gt;कानो में तुम कहती रहना, मधु का प्याला मधुशाला।।८१।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे अधरों पर हो अंितम वस्तु न तुलसीदल प्याला&lt;br /&gt;मेरी जीव्हा पर हो अंतिम वस्तु न गंगाजल हाला,&lt;br /&gt;मेरे शव के पीछे चलने वालों याद इसे रखना&lt;br /&gt;राम नाम है सत्य न कहना, कहना सच्ची मधुशाला।।८२।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे शव पर वह रोये, हो जिसके आंसू में हाला&lt;br /&gt;आह भरे वो, जो हो सुरिभत मदिरा पी कर मतवाला,&lt;br /&gt;दे मुझको वो कान्धा जिनके पग मद डगमग होते हों&lt;br /&gt;और जलूं उस ठौर जहां पर कभी रही हो मधुशाला।।८३।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और चिता पर जाये उंढेला पत्र न घ्रित का, पर प्याला&lt;br /&gt;कंठ बंधे अंगूर लता में मध्य न जल हो, पर हाला,&lt;br /&gt;प्राण प्रिये यदि श्राध करो तुम मेरा तो ऐसे करना&lt;br /&gt;पीने वालांे को बुलवा कऱ खुलवा देना मधुशाला।।८४।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नाम अगर कोई पूछे तो, कहना बस पीनेवाला&lt;br /&gt;काम ढालना, और ढालना सबको मदिरा का प्याला,&lt;br /&gt;जाति प्रिये, पूछे यदि कोई कह देना दीवानों की &lt;br /&gt;धर्म बताना प्यालों की ले माला जपना मधुशाला।।८५।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज्ञात हुआ यम आने को है ले अपनी काली हाला,&lt;br /&gt;पंिडत अपनी पोथी भूला, साधू भूल गया माला,&lt;br /&gt;और पुजारी भूला पूजा, ज्ञान सभी ज्ञानी भूला,&lt;br /&gt;किन्तु न भूला मरकर के भी पीनेवाला मधुशाला।।८६।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यम ले चलता है मुझको तो, चलने दे लेकर हाला,&lt;br /&gt;चलने दे साकी को मेरे साथ लिए कर में प्याला,&lt;br /&gt;स्वर्ग, नरक या जहाँ कहीं भी तेरा जी हो लेकर चल,&lt;br /&gt;ठौर सभी हैं एक तरह के साथ रहे यदि मधुशाला।।८७।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाप अगर पीना, समदोषी तो तीनों - साकी बाला,&lt;br /&gt;नित्य पिलानेवाला प्याला, पी जानेवाली हाला,&lt;br /&gt;साथ इन्हें भी ले चल मेरे न्याय यही बतलाता है,&lt;br /&gt;कैद जहाँ मैं हूँ, की जाए कैद वहीं पर मधुशाला।।८८।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शांत सकी हो अब तक, साकी, पीकर किस उर की ज्वाला,&lt;br /&gt;'और, और' की रटन लगाता जाता हर पीनेवाला,&lt;br /&gt;कितनी इच्छाएँ हर जानेवाला छोड़ यहाँ जाता!&lt;br /&gt;कितने अरमानों की बनकर कब्र खड़ी है मधुशाला।।८९।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो हाला मैं चाह रहा था, वह न मिली मुझको हाला,&lt;br /&gt;जो प्याला मैं माँग रहा था, वह न मिला मुझको प्याला,&lt;br /&gt;जिस साकी के पीछे मैं था दीवाना, न मिला साकी,&lt;br /&gt;जिसके पीछे था मैं पागल, हा न मिली वह मधुशाला!।९०।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देख रहा हूँ अपने आगे कब से माणिक-सी हाला,&lt;br /&gt;देख रहा हूँ अपने आगे कब से कंचन का प्याला,&lt;br /&gt;'बस अब पाया!'- कह-कह कब से दौड़ रहा इसके पीछे,&lt;br /&gt;किंतु रही है दूर क्षितिज-सी मुझसे मेरी मधुशाला।।९१।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी निराशा का तम घिरता, छिप जाता मधु का प्याला,&lt;br /&gt;छिप जाती मदिरा की आभा, छिप जाती साकीबाला,&lt;br /&gt;कभी उजाला आशा करके प्याला फिर चमका जाती,&lt;br /&gt;आँखिमचौली खेल रही है मुझसे मेरी मधुशाला।।९२।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'आ आगे' कहकर कर पीछे कर लेती साकीबाला,&lt;br /&gt;होंठ लगाने को कहकर हर बार हटा लेती प्याला,&lt;br /&gt;नहीं मुझे मालूम कहाँ तक यह मुझको ले जाएगी,&lt;br /&gt;बढ़ा बढ़ाकर मुझको आगे, पीछे हटती मधुशाला।।९३।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाथों में आने-आने में, हाय, फिसल जाता प्याला,&lt;br /&gt;अधरों पर आने-आने में हाय, ढुलक जाती हाला,&lt;br /&gt;दुनियावालो, आकर मेरी किस्मत की ख़ूबी देखो,&lt;br /&gt;रह-रह जाती है बस मुझको मिलते-िमलते मधुशाला।।९४।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्राप्य नही है तो, हो जाती लुप्त नहीं फिर क्यों हाला,&lt;br /&gt;प्राप्य नही है तो, हो जाता लुप्त नहीं फिर क्यों प्याला,&lt;br /&gt;दूर न इतनी हिम्मत हारुँ, पास न इतनी पा जाऊँ,&lt;br /&gt;व्यर्थ मुझे दौड़ाती मरु में मृगजल बनकर मधुशाला।।९५।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मिले न, पर, ललचा ललचा क्यों आकुल करती है हाला,&lt;br /&gt;मिले न, पर, तरसा तरसाकर क्यों तड़पाता है प्याला,&lt;br /&gt;हाय, नियति की विषम लेखनी मस्तक पर यह खोद गई&lt;br /&gt;'दूर रहेगी मधु की धारा, पास रहेगी मधुशाला!'।९६।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मदिरालय में कब से बैठा, पी न सका अब तक हाला,&lt;br /&gt;यत्न सहित भरता हूँ, कोई किंतु उलट देता प्याला,&lt;br /&gt;मानव-बल के आगे निर्बल भाग्य, सुना विद्यालय में,&lt;br /&gt;'भाग्य प्रबल, मानव निर्बल' का पाठ पढ़ाती मधुशाला।।९७।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किस्मत में था खाली खप्पर, खोज रहा था मैं प्याला,&lt;br /&gt;ढूँढ़ रहा था मैं मृगनयनी, किस्मत में थी मृगछाला,&lt;br /&gt;किसने अपना भाग्य समझने में मुझसा धोखा खाया,&lt;br /&gt;किस्मत में था अवघट मरघट, ढूँढ़ रहा था मधुशाला।।९८।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस प्याले से प्यार मुझे जो दूर हथेली से प्याला,&lt;br /&gt;उस हाला से चाव मुझे जो दूर अधर से है हाला,&lt;br /&gt;प्यार नहीं पा जाने में है, पाने के अरमानों में!&lt;br /&gt;पा जाता तब, हाय, न इतनी प्यारी लगती मधुशाला।।९९।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साकी के पास है तिनक सी श्री, सुख, संपित की हाला,&lt;br /&gt;सब जग है पीने को आतुर ले ले किस्मत का प्याला,&lt;br /&gt;रेल ठेल कुछ आगे बढ़ते, बहुतेरे दबकर मरते,&lt;br /&gt;जीवन का संघर्ष नहीं है, भीड़ भरी है मधुशाला।।१००।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साकी, जब है पास तुम्हारे इतनी थोड़ी सी हाला,&lt;br /&gt;क्यों पीने की अभिलषा से, करते सबको मतवाला,&lt;br /&gt;हम पिस पिसकर मरते हैं, तुम छिप छिपकर मुसकाते हो,&lt;br /&gt;हाय, हमारी पीड़ा से है क्रीड़ा करती मधुशाला।।१०१।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साकी, मर खपकर यदि कोई आगे कर पाया प्याला,&lt;br /&gt;पी पाया केवल दो बूंदों से न अधिक तेरी हाला,&lt;br /&gt;जीवन भर का, हाय, पिरश्रम लूट लिया दो बूंदों ने,&lt;br /&gt;भोले मानव को ठगने के हेतु बनी है मधुशाला।।१०२।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिसने मुझको प्यासा रक्खा बनी रहे वह भी हाला,&lt;br /&gt;जिसने जीवन भर दौड़ाया बना रहे वह भी प्याला,&lt;br /&gt;मतवालों की जिहवा से हैं कभी निकलते शाप नहीं,&lt;br /&gt;दुखी बनाय जिसने मुझको सुखी रहे वह मधुशाला!।१०३।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नहीं चाहता, आगे बढ़कर छीनूँ औरों की हाला,&lt;br /&gt;नहीं चाहता, धक्के देकर, छीनूँ औरों का प्याला,&lt;br /&gt;साकी, मेरी ओर न देखो मुझको तिनक मलाल नहीं,&lt;br /&gt;इतना ही क्या कम आँखों से देख रहा हूँ मधुशाला।।१०४।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मद, मदिरा, मधु, हाला सुन-सुन कर ही जब हूँ मतवाला,&lt;br /&gt;क्या गति होगी अधरों के जब नीचे आएगा प्याला,&lt;br /&gt;साकी, मेरे पास न आना मैं पागल हो जाऊँगा,&lt;br /&gt;प्यासा ही मैं मस्त, मुबारक हो तुमको ही मधुशाला।।१०५।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या मुझको आवश्यकता है साकी से माँगूँ हाला,&lt;br /&gt;क्या मुझको आवश्यकता है साकी से चाहूँ प्याला,&lt;br /&gt;पीकर मदिरा मस्त हुआ तो प्यार किया क्या मदिरा से!&lt;br /&gt;मैं तो पागल हो उठता हूँ सुन लेता यदि मधुशाला।।१०६।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देने को जो मुझे कहा था दे न सकी मुझको हाला,&lt;br /&gt;देने को जो मुझे कहा था दे न सका मुझको प्याला,&lt;br /&gt;समझ मनुज की दुर्बलता मैं कहा नहीं कुछ भी करता,&lt;br /&gt;किन्तु स्वयं ही देख मुझे अब शरमा जाती मधुशाला।।१०७।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक समय संतुष्ट बहुत था पा मैं थोड़ी-सी हाला,&lt;br /&gt;भोला-सा था मेरा साकी, छोटा-सा मेरा प्याला,&lt;br /&gt;छोटे-से इस जग की मेरे स्वर्ग बलाएँ लेता था,&lt;br /&gt;विस्तृत जग में, हाय, गई खो मेरी नन्ही मधुशाला!।१०८।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुतेरे मदिरालय देखे, बहुतेरी देखी हाला,&lt;br /&gt;भाँित भाँित का आया मेरे हाथों में मधु का प्याला,&lt;br /&gt;एक एक से बढ़कर, सुन्दर साकी ने सत्कार किया,&lt;br /&gt;जँची न आँखों में, पर, कोई पहली जैसी मधुशाला।।१०९।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक समय छलका करती थी मेरे अधरों पर हाला,&lt;br /&gt;एक समय झूमा करता था मेरे हाथों पर प्याला,&lt;br /&gt;एक समय पीनेवाले, साकी आलिंगन करते थे,&lt;br /&gt;आज बनी हूँ निर्जन मरघट, एक समय थी मधुशाला।।११०।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जला हृदय की भट्टी खींची मैंने आँसू की हाला,&lt;br /&gt;छलछल छलका करता इससे पल पल पलकों का प्याला,&lt;br /&gt;आँखें आज बनी हैं साकी, गाल गुलाबी पी होते,&lt;br /&gt;कहो न विरही मुझको, मैं हूँ चलती फिरती मधुशाला!।१११।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कितनी जल्दी रंग बदलती है अपना चंचल हाला,&lt;br /&gt;कितनी जल्दी घिसने लगता हाथों में आकर प्याला,&lt;br /&gt;कितनी जल्दी साकी का आकर्षण घटने लगता है,&lt;br /&gt;प्रात नहीं थी वैसी, जैसी रात लगी थी मधुशाला।।११२।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बूँद बूँद के हेतु कभी तुझको तरसाएगी हाला,&lt;br /&gt;कभी हाथ से छिन जाएगा तेरा यह मादक प्याला,&lt;br /&gt;पीनेवाले, साकी की मीठी बातों में मत आना,&lt;br /&gt;मेरे भी गुण यों ही गाती एक दिवस थी मधुशाला।।११३।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छोड़ा मैंने पथ मतों को तब कहलाया मतवाला,&lt;br /&gt;चली सुरा मेरा पग धोने तोड़ा जब मैंने प्याला,&lt;br /&gt;अब मानी मधुशाला मेरे पीछे पीछे फिरती है,&lt;br /&gt;क्या कारण? अब छोड़ दिया है मैंने जाना मधुशाला।।११४।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह न समझना, पिया हलाहल मैंने, जब न मिली हाला,&lt;br /&gt;तब मैंने खप्पर अपनाया ले सकता था जब प्याला,&lt;br /&gt;जले हृदय को और जलाना सूझा, मैंने मरघट को&lt;br /&gt;अपनाया जब इन चरणों में लोट रही थी मधुशाला।।११५।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कितनी आई और गई पी इस मदिरालय में हाला,&lt;br /&gt;टूट चुकी अब तक कितने ही मादक प्यालों की माला,&lt;br /&gt;कितने साकी अपना अपना काम खतम कर दूर गए,&lt;br /&gt;कितने पीनेवाले आए, किन्तु वही है मधुशाला।।११६।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कितने होठों को रक्खेगी याद भला मादक हाला,&lt;br /&gt;कितने हाथों को रक्खेगा याद भला पागल प्याला,&lt;br /&gt;कितनी शक्लों को रक्खेगा याद भला भोला साकी,&lt;br /&gt;कितने पीनेवालों में है एक अकेली मधुशाला।।११७।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दर दर घूम रहा था जब मैं चिल्लाता - हाला! हाला!&lt;br /&gt;मुझे न मिलता था मदिरालय, मुझे न मिलता था प्याला,&lt;br /&gt;मिलन हुआ, पर नहीं मिलनसुख लिखा हुआ था किस्मत में,&lt;br /&gt;मैं अब जमकर बैठ गया हँू, घूम रही है मधुशाला।।११८।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं मदिरालय के अंदर हूँ, मेरे हाथों में प्याला,&lt;br /&gt;प्याले में मदिरालय बिंिबत करनेवाली है हाला,&lt;br /&gt;इस उधेड़-बुन में ही मेरा सारा जीवन बीत गया -&lt;br /&gt;मैं मधुशाला के अंदर या मेरे अंदर मधुशाला!।११९।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसे नहीं पीने से नाता, किसे नहीं भाता प्याला,&lt;br /&gt;इस जगती के मदिरालय में तरह-तरह की है हाला,&lt;br /&gt;अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार सभी पी मदमाते,&lt;br /&gt;एक सभी का मादक साकी, एक सभी की मधुशाला।।१२०।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह हाला, कर शांत सके जो मेरे अंतर की ज्वाला, &lt;br /&gt;जिसमें मैं बिंिबत-प्रतिबंिबत प्रतिपल, वह मेरा प्याला,&lt;br /&gt;मधुशाला वह नहीं जहाँ पर मदिरा बेची जाती है,&lt;br /&gt;भेंट जहाँ मस्ती की मिलती मेरी तो वह मधुशाला।।१२१।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मतवालापन हाला से ले मैंने तज दी है हाला,&lt;br /&gt;पागलपन लेकर प्याले से, मैंने त्याग दिया प्याला,&lt;br /&gt;साकी से मिल, साकी में मिल अपनापन मैं भूल गया,&lt;br /&gt;मिल मधुशाला की मधुता में भूल गया मैं मधुशाला।।१२२।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मदिरालय के द्वार ठोंकता किस्मत का छंछा प्याला,&lt;br /&gt;गहरी, ठंडी सांसें भर भर कहता था हर मतवाला,&lt;br /&gt;कितनी थोड़ी सी यौवन की हाला, हा, मैं पी पाया!&lt;br /&gt;बंद हो गई कितनी जल्दी मेरी जीवन मधुशाला।।१२३।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहाँ गया वह स्वर्गिक साकी, कहाँ गयी सुरिभत हाला,&lt;br /&gt;कहँा गया स्वपिनल मदिरालय, कहाँ गया स्वर्णिम प्याला!&lt;br /&gt;पीनेवालों ने मदिरा का मूल्य, हाय, कब पहचाना?&lt;br /&gt;फूट चुका जब मधु का प्याला, टूट चुकी जब मधुशाला।।१२४।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने युग में सबको अनुपम ज्ञात हुई अपनी हाला, &lt;br /&gt;अपने युग में सबको अदभुत ज्ञात हुआ अपना प्याला,&lt;br /&gt;फिर भी वृद्धों से जब पूछा एक यही उज्ञल्तऌार पाया -&lt;br /&gt;अब न रहे वे पीनेवाले, अब न रही वह मधुशाला!।१२५।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मय' को करके शुद्ध दिया अब नाम गया उसको, 'हाला'&lt;br /&gt;'मीना' को 'मधुपात्र' दिया 'सागर' को नाम गया 'प्याला',&lt;br /&gt;क्यों न मौलवी चौंकें, बिचकें तिलक-त्रिपुंडी पंिडत जी&lt;br /&gt;'मय-महिफल' अब अपना ली है मैंने करके 'मधुशाला'।।१२६।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कितने मर्म जता जाती है बार-बार आकर हाला,&lt;br /&gt;कितने भेद बता जाता है बार-बार आकर प्याला,&lt;br /&gt;कितने अर्थों को संकेतों से बतला जाता साकी,&lt;br /&gt;फिर भी पीनेवालों को है एक पहेली मधुशाला।।१२७।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जितनी दिल की गहराई हो उतना गहरा है प्याला,&lt;br /&gt;जितनी मन की मादकता हो उतनी मादक है हाला,&lt;br /&gt;जितनी उर की भावुकता हो उतना सुन्दर साकी है,&lt;br /&gt;जितना ही जो रिसक, उसे है उतनी रसमय मधुशाला।।१२८।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन अधरों को छुए, बना दे मस्त उन्हें मेरी हाला,&lt;br /&gt;जिस कर को छूू दे, कर दे विक्षिप्त उसे मेरा प्याला,&lt;br /&gt;आँख चार हों जिसकी मेरे साकी से दीवाना हो,&lt;br /&gt;पागल बनकर नाचे वह जो आए मेरी मधुशाला।।१२९।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर जिहवा पर देखी जाएगी मेरी मादक हाला&lt;br /&gt;हर कर में देखा जाएगा मेरे साकी का प्याला&lt;br /&gt;हर घर में चर्चा अब होगी मेरे मधुविक्रेता की&lt;br /&gt;हर आंगन में गमक उठेगी मेरी सुरिभत मधुशाला।।१३०।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी हाला में सबने पाई अपनी-अपनी हाला,&lt;br /&gt;मेरे प्याले में सबने पाया अपना-अपना प्याला,&lt;br /&gt;मेरे साकी में सबने अपना प्यारा साकी देखा,&lt;br /&gt;जिसकी जैसी रुिच थी उसने वैसी देखी मधुशाला।।१३१।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह मदिरालय के आँसू हैं, नहीं-नहीं मादक हाला,&lt;br /&gt;यह मदिरालय की आँखें हैं, नहीं-नहीं मधु का प्याला,&lt;br /&gt;किसी समय की सुखदस्मृति है साकी बनकर नाच रही,&lt;br /&gt;नहीं-नहीं किव का हृदयांगण, यह विरहाकुल मधुशाला।।१३२। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुचल हसरतें कितनी अपनी, हाय, बना पाया हाला,&lt;br /&gt;कितने अरमानों को करके ख़ाक बना पाया प्याला!&lt;br /&gt;पी पीनेवाले चल देंगे, हाय, न कोई जानेगा,&lt;br /&gt;कितने मन के महल ढहे तब खड़ी हुई यह मधुशाला!।१३३।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विश्व तुम्हारे विषमय जीवन में ला पाएगी हाला&lt;br /&gt;यदि थोड़ी-सी भी यह मेरी मदमाती साकीबाला,&lt;br /&gt;शून्य तुम्हारी घड़ियाँ कुछ भी यदि यह गुंजित कर पाई,&lt;br /&gt;जन्म सफल समझेगी जग में अपना मेरी मधुशाला।।१३४।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बड़े-बड़े नाज़ों से मैंने पाली है साकीबाला,&lt;br /&gt;किलत कल्पना का ही इसने सदा उठाया है प्याला,&lt;br /&gt;मान-दुलारों से ही रखना इस मेरी सुकुमारी को,&lt;br /&gt;विश्व, तुम्हारे हाथों में अब सौंप रहा हूँ मधुशाला।।१३५।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिरिशष्ट से&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वयं नहीं पीता, औरों को, किन्तु पिला देता हाला,&lt;br /&gt;स्वयं नहीं छूता, औरों को, पर पकड़ा देता प्याला,&lt;br /&gt;पर उपदेश कुशल बहुतेरों से मैंने यह सीखा है,&lt;br /&gt;स्वयं नहीं जाता, औरों को पहुंचा देता मधुशाला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं कायस्थ कुलोदभव मेरे पुरखों ने इतना ढ़ाला,&lt;br /&gt;मेरे तन के लोहू में है पचहज्ञल्तऌार प्रतिशत हाला,&lt;br /&gt;पुश्तैनी अधिकार मुझे है मदिरालय के आँगन पर,&lt;br /&gt;मेरे दादों परदादों के हाथ बिकी थी मधुशाला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुतों के सिर चार दिनों तक चढ़कर उतर गई हाला,&lt;br /&gt;बहुतों के हाथों में दो दिन छलक झलक रीता प्याला,&lt;br /&gt;पर बढ़ती तासीर सुरा की साथ समय के, इससे ही&lt;br /&gt;और पुरानी होकर मेरी और नशीली मधुशाला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पित्र पक्ष में पुत्र उठाना अर्ध्य न कर में, पर प्याला&lt;br /&gt;बैठ कहीं पर जाना, गंगा सागर में भरकर हाला&lt;br /&gt;किसी जगह की मिटटी भीगे, तृप्ति मुझे मिल जाएगी&lt;br /&gt;तर्पण अर्पण करना मुझको, पढ़ पढ़ कर के मधुशाला।&lt;br /&gt;                           -हरिवंश राय बच्चन&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' 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